Sunday, November 18, 2012

धन और ताकत से नहीं मिलती खुशी -Dalai Lama

हम पैसे या ताकत से खुशी नहीं खरीद सकते। जो जितना शक्तिशाली है, उसके अंदर उतनी ही ज्यादा चिंता और भय है। यह भय और चिंता ही हमारे दुखों की वजह है। मानसिक सुख आपकी शारीरिक पीड़ा को हल्का कर सकता है लेकिन भौतिक सुख आपकी मानसिक पीड़ा को कम नहीं कर सकता।
वह तिब्बतियों के 14वें धर्मगुरु हैं, लेकिन लगभग पूरी दुनिया उन्हें किसी शासनाध्यक्ष की तरह ही सम्मान देती है। यह दलाई लामा की मेहनत ही है, जिसने तिब्बत की आजादी के सवाल को कभी मरने नहीं दिया। आज नोबेल पुरस्कार विजेता दलाई लामा को मानवता का सबसे बड़ा हिमायती माना जाता है। आयरलैंड की लिमरिक यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए दलाई लामा ने कहा कि दुनिया में शांति के लिए मानवीय मूल्यों को प्रोत्साहित करना होगा। पेश हैं, भाषण के अंश:
मानवता पर विचार
मैं यहां खड़ा होकर बोलूंगा, ताकि आप सबको देख सकूं। सबसे पहले मैं आप सबको एक बात समझाना चाहता हूं कि हम सब इंसान हैं। हम सब एक जैसे हैं, हमारी भावनाएं एक हैं, हमारे एहसास समान हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम किस धर्म के हैं, किस जाति के हैं और किस देश के हैं। पूरी दुनिया में मानवता एक है। आज हमारे बीच में जो भी समस्याएं हैं, उनकी  वजह यह है कि हम इंसानियत को भूल जाते हैं। मैं भी एक साधारण इंसान हूं, मैं आपसे अलग नहीं हूं। हमें दूसरों को समझना होगा, उन्हें तवज्जो देनी होगी। आप चाहे जितने अमीर हों, चाहे जितने शक्तिशाली हों, आप इंसान ही रहेंगे। इंसानियत से ऊपर कुछ नहीं है। हम इंसानियत को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
‘मैं’ की भावना
ज्यादातर लोग ‘मैं’ और ‘मेरा’ के भ्रम में पड़े रहते हैं। पर कोई नहीं जानता कि ‘मैं’ क्या है? ‘मेरा’ से उनका क्या आशय है? कई बार हमारे अंदर मौजूद यह ‘मैं’ की भावना दर्द की वजह बन जाती है। अगर हम सब ‘मैं’ की बजाय एक-दूसरे के बारे में सोचें, तो हमारे दुखों का अंत आसानी से हो जाएगा। ‘मैं’ की भावना हमारे अंदर स्वार्थ की भावना पैदा करती है और हम दूसरों के दर्द को समझ नहीं पाते हैं। हमें अपने बारे में जरूर सोचना चाहिए, पर साथ ही दूसरों के बारे में भी विचार करना चाहिए, ताकि हम बेहतर समाज बना सकें।
सच्ची खुशी
सच्ची खुशी का रास्ता हमारे अंदर है। हम पैसे या ताकत से खुशी नहीं खरीद सकते। सच तो यह है कि जो जितना शक्तिशाली है, उसके अंदर उतना ही ज्यादा भय व चिंता है। पैसों के बल पर आप शांति व प्रेम हासिल नहीं कर सकते। सच्ची खुशी तभी मिलती है, जब हम दूसरों का भरोसा जीत पाते हैं। आपसी विश्वास के बल पर ही हम दूसरों से दोस्ती व सहयोग का रिश्ता बना पाते हैं। सच्ची खुशी पाने के लिए दोस्ती, सहयोग व प्रेम जरूरी है। पैसे व ताकत के साथ ही हमारे अंदर अविश्वास व डर की भावना गहरी हो जाती है और हम दुखी हो जाते हैं।
दया की भावना
हम दूसरों के दुखों को नजरअंदाज करके खुश नहीं रह सकते, इसलिए अपने स्वार्थो से ऊपर उठकर दूसरों के बारे में विचार करें, उनकी मदद करें। यह आप तभी कर पाएंगे, जब आपके मन में दया का भाव होगा। यकीन कीजिए, हम सबके अंदर जन्म से ही दया, प्यार व लगाव की भावना है, पर स्वार्थ में पड़कर हम इन भावनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। हमें इससे ऊपर उठना होगा। हम सिर्फ अपने बारे में नहीं सोच सकते, हमें दूसरों के बारे में भी सोचना होगा, उनकी चिंता करनी होगी, उनकी मदद करनी होगी।
गुस्से से नुकसान
एक और अहम बात। गुस्सा हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के लिए ठीक नहीं है। हम जितने शांत रहेंगे, हमारी सेहत उतनी ही अच्छी रहेगी और जीवन सुखमय होगा। गुस्सा हमारे जीवन को अशांत बनाता है। हमारे चारों तरफ के माहौल को खराब करता है। अगर हम शांत रहेंगे, तो बड़ी से बड़ी समस्या आने पर भी आसानी से उसका हल खोज लेंगे। अशांत मन समस्याओं को और गंभीर बना देता है। हमें गुस्से पर काबू रखना होगा। इसके लिए हमें शांत रहने, दूसरों से प्रेम करने व दूसरों के प्रति दया का भाव पैदा करना होगा। अगर हमारे मन में दूसरों के प्रति दया व प्रेम होगा, तो सकारात्मक दिशा में पहल कर पाएंगे। दूसरों की मदद का एहसास मन को शांत करेगा और हम गुस्से से छुटकारा पा सकेंगे।
जीवन के मूल्य
तमाम लोगों को मैंने देखा है वे खुद को खुश करने के लिए या तो टीवी से चिपके रहेंगे या फिर संगीत सुनेंगे। इससे मन की शांति नहीं मिलने वाली है। मन की शांति के लिए खुद के अंदर झांकना जरूरी है। अगर हम खुद को पहचानने की कोशिश करेंगे, तो हमें अपार शांति  मिलेगी। एक बात याद रखिए, मन की शांति भौतिककष्ट को कम सकती है, पर भौतिक सुख आपके मन के दुख को कम नहीं कर सकता। मन की शांति के लिए हमें नैतिक मूल्यों पर जोर देना होगा। हमें अपने बच्चों को नैतिकता के प्रति जागरूक बनाना होगा, ताकि बड़े होकर वे सही राह पर चल सकें। खुद को खुश करने के लिए हम दूसरों को दुखी नहीं कर सकते, बल्कि यदि आप दूसरों को खुशी देने की कोशिश करेंगे, तो आपको मन की शांति के साथ ही सुख का भी एहसास होगा।
सभी धर्मों का सम्मान
हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने का अधिकार है। लेकिन हमारे मन में दूसरों के धर्म के प्रति भी सम्मान होना चाहिए। न केवल धर्मो के प्रति, बल्कि हमें उनका भी सम्मान करना चाहिए, जो किसी धर्म में विश्वास नहीं रखते हैं, जो नास्तिक हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम सब इंसान हैं और हमें एक-दूसरे से प्रेमभाव रखना है। यह भावना पूरी दुनिया में धार्मिक सौहार्द के लिए बहुत जरूरी है। अगर हम दुनिया में शांति चाहते हैं, तो हमें धार्मिक भाईचारे और सौहार्द की भावना विकसित करनी होगी।


प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

http://www.livehindustan.com/news/editorial/aapkitaarif/article1-story-57-65-281953.html

2 comments:

  1. यही सत्य है। इसी में सभी धर्मों का सार है।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट "समय की भी उम्र होती है",पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

    ReplyDelete